Rahat Indori Best Hindi Shayari Collection, Top Love Hindi Shayari June 22, 2022 by admin

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दोस्तो में आप के लिए बहुत ही बड़ी नवीनतम शायरी लेकर आया हूं दोस्तों आप सब क Mashayari में 2021 की नई शायरी पढ़ने को मिल जाएगी या दोस्तों आप को वेबसाइट है हिंदी सभी शायरी पढ़ने को मिल जाएगी दोस्तों वेबसाइट मैं सभी All शायरी को खोज कर सकते हैं मेरी वेबसाइट पर आने के लिए धन्यवाद।

हमे बिलकुल अप के लिए कुछ खास करना चाहिए इसलिए हम आपके लिए लेकर आए है राहत इंदौरी शायरी जिसे आप ग्रीटिंग कार्ड, व्हाट्सएप्प या फिर सोशल मीडिया पर लिख दे सकते है| यह बहुत ही शानदार और दिल को छू लेने वाली शायरी है.

Rahat indori shayari collection Top Hindi Shayari

बुलाती है मगर जाने का नहीं ये दुनिया है इधर
जाने का नहींमेरे बेटे किसी से इश्क़ करमगर हद से
 गुज़र जाने का नहींज़मीं भी सर पे रखनी हो तो
रखो चले हो तो ठहर जाने का नहींसितारे नोच कर
ले जाऊंगामैं खाली हाथ घर जाने का नहीं वबा फैली
हुई है हर तरफ अभी माहौल मर जाने का नहीं वो गर्दन
 नापता है नाप लेमगर जालिम से डर जाने का नहीं

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तेरी हर बात मोहब्बत में गवारा करके

दिल के बाज़ार में बैठे हैँ ख़सारा करके

आसमानो की तरफ फेक दिया है मैंने

चंद मिट्टी के चिरागों को सितारा करके

एक चिन्गारी नज़र आई थी बस्ती मेँ उसे

वो अलग हट गया आँधी को इशारा करके

मैं वो दरिया हूँ कि हर बूँद भंवर है जिसकी

तुमने अच्छा ही किया मुझसे किनारा करके


आते जाते है कई रंग मेरे चेहरे पर

लोग लेते है मज़ा जिक्र तुम्हारा करके

मुन्तज़िर हूँ कि सितारों की ज़रा आँख लगे

चाँद को छत पे बुला लूँगा इशारा करके

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सिर्फ खंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए,

ऐ खुदा दुश्मन भी मुझको खानदानी चाहिए

मैंने अपनी खुश्क आँखों से लहू छलका दिआ,

एक समन्दर कह रहा था मुझको पानी चाहिए।

सिर्फ खबरों की ज़मीने देके मत बहलाइये

राजधानी दी थी हमने, राजधानी चाहिए

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हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते हैं

मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिन्दुस्तान कहते हैं

जो दुनिया में सुनाई दे उसे कहते है ख़ामोशी

जो आँखों में दिखाई दे उसे तूफान कहते है

जो ये दीवार का सुराख है साज़िश का हिस्सा है

मगर हम इसको अपने घर का रोशनदान कहते हैं

ये ख्वाहिश दो निवालों की हमें बर्तन की हाजत क्या

फ़क़ीर अपनी हथेली को ही दस्तरख्वान कहते हैं

मेरे अंदर से एक-एक करके सब कुछ हो गया रुखसत

मगर एक चीज़ बाकी है जिसे ईमान कहते हैं

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गुलाब ख़्वाब दवा ज़हर जाम क्या-क्या है

मैं आ गया हूँ बता इन्तज़ाम क्या-क्या है

फक़ीर शेख कलन्दर इमाम क्या-क्या है

तुझे पता नहीं तेरा गुलाम क्या क्या है

अमीर-ए-शहर के कुछ कारोबार याद आए

मैँ रात सोच रहा था हराम क्या-क्या है

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अगर खिलाफ है होने दो जान थोड़ी है,

ये सब धुँआ है कोई आसमान थोड़ी है |

लगेगी आग तो आएंगे घर कई ज़द में,

यहाँ पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है |

हमारे मुह से जो निकले वही सदाकत है,

हमरे मुह में तुम्हारी जबान थोड़ी है |

मै जानता हूँ कि दुश्मन भी कम नहीं है,

लेकिन हमारी तरह हथेली पे जान थोड़ी है |

आज शाहिबे मसनद है कल नहीं होंगे,

किरायेदार है जात्ती मकान थोड़ी है |

सभी का खून है शामिल इस मिट्टी में,

किसे के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है |

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मेरे हुजरे में नहीं और कही पर रख दो,

आसमा लाये हो ले आओ जमी पर रख दो |

मैंने जिस ताक में कुछ टूटे दीए रखे हैं

चाँद तारों को भी ले जाके वही पर रख दो

अब कहा ढूंढने जाओगे हमारे कातिल,

आप तो क़त्ल का इल्जाम हमी पर रख दो |

हो वो जमुना का किनारा ये कोई शर्त नहीं

मिट्टी मिट्टी ही में रखनी है कही पर रख दो

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हम अपने आसुओ को चुन रहे है

सितारे किस लिए जल-भून रहे है

कभी उसका तबस्सुम छू गया था

उजाले आजतक सर धुन रहे है

अभी मत छेड़िये जिक्र-ए-महोब्बत

जलालुद्दीन अकबर सुन रहे है

जवानिओं में जवानी को धुल करते हैं

जो लोग भूल नहीं करते, भूल करते हैं

अगर अनारकली हैं सबब बगावत का

सलीम, हम तेरी शर्ते कबूल करते हैं

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कश्ती तेरा नसीब चमकदार कर दिया

इस पार के थपेड़ों ने उस पार कर दिया

अफवाह थी की मेरी तबियत ख़राब हैं

लोगो ने पूछ पूछ के बीमार कर दिया

रातों को चांदनी के भरोसें ना छोड़ना

सूरज ने जुगनुओं को ख़बरदार कर दिया

रुक रुक के लोग देख रहे है मेरी तरफ

तुमने ज़रा सी बात को अखबार कर दिया

इस बार एक और भी दीवार गिर गयी

बारिश ने मेरे घर को हवादार कर दिया

बोला था सच तो ज़हर पिलाया गया मुझे

अच्छाइयों ने मुझे गुनहगार कर दिया

दो गज सही ये मेरी मिलकियत तो हैं

ऐ मौत तूने मुझे ज़मीदार कर दिया

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राहत इंदौरी के 20 चुनिंदा शेर…


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नई हवाओं कि सोभत बिगाड़ देती है,

कबूतरों को खुली छत बिगाड़ देती है |

जो जुर्म करते है इतने बुरे नहीं होते,

सजा न देके अदालत बिगाड़ देती है |

मिलाना चाहा है  इंसा को जब भी इंसा से,

तो सारे काम सियासत बिगाड़ देती है |

हमारे पीर तकीमीर ने कहा था कभी,

मिया ये आशिकी इज्जत बिगाड़ देती है |

ये चलती-फिरती दुकानों की तरह होते है

नए अमीरों को दौलत बिगाड़ देती है

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कभी अकेले में मिल कर झिंझोड़ दूँगा उसे,

जहाँ जहाँ से वो टूटा है जोड़ दूँगा उसे |

मुझे वो छोड़ गया ये कमाल है उसका,

इरादा मैंने किया था कि छोड़ दूँगा उसे |

पसीने बाँटता फिरता है हर तरफ़ सूरज,

कभी जो हाथ लगा तो निचोड़ दूँगा उसे |

बदन चुरा के वो चलता है मुझ से शीशा-बदन,

उसे ये डर है कि मैं तोड़ फोड़ दूँगा उसे |

मज़ा चखा के ही माना हूँ मैं भी दुनिया को,

समझ रही थी कि ऐसे ही छोड़ दूँगा उसे |

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मुझमे कितने राज़ हैं, बतलाऊं क्या

बन्द एक मुद्दत से हूं, खुल जाऊं क्या ?

आजिजी, मिन्नत, ख़ुशामद, इल्तिजा,

और मैं क्या क्या करूँ, मर जाऊं क्या ?

कल यहां मैं था जहां तुम आज हो

मैं तुम्हारी ही तरह इतराऊं क्या?

तेरे जलसे में तेरा परचम लिए

सैकड़ों लाशें भी हैं गिनवाऊं क्या ?

एक पत्थर है वो मेरी राह का,

गर न ठुकराऊं, तो ठोकर खाऊं क्या?

फिर जगाया तूने सोये शेर को

फिर वही लहजा दराज़ी ! आऊं क्या ?

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काम सब ग़ैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैं

और हम कुछ नहीं करते हैं ग़ज़ब करते हैं

आप की नज़रों में सूरज की है जितनी अज़्मत

हम चराग़ों का भी उतना ही अदब करते हैं

हम पे हाकिम का कोई हुक्म नहीं चलता है

हम क़लंदर हैं शहंशाह लक़ब करते हैं

देखिए जिस को उसे धुन है मसीहाई की

आज कल शहर के बीमार मतब करते हैं

ख़ुद को पत्थर सा बना रक्खा है कुछ लोगों ने

बोल सकते हैं मगर बात ही कब करते हैं

एक एक पल को किताबों की तरह पढ़ने लगे उम्र भर

जो न किया हम ने वो अब करते हैं

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चेहरों के लिए आईने कुर्बान किये हैं,

इस शौक में अपने बड़े नुकसान किये हैं,​

महफ़िल में मुझे गालियाँ देकर है बहुत खुश​,

जिस शख्स पर मैंने बड़े एहसान किये है।

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उसे अब के वफाओं से गुजर जाने की जल्दी थी

मगर इस बार मुझ को अपने घर जाने की जल्दी थी

इरादा था कि मैं कुछ देर तूफाँ का मज़ा लेता

मगर बेचारे दरिया को उतर जाने की जल्दी थी

मैं अपनी मुट्ठियों मैं क़ैद कर लेता ज़मीनों को

मगर मेरे क़बीले को बिखर जाने की जल्दी थी

मैं आखिर कौनसा मौसम तुम्हारे नाम कर देता

यहाँ हर एक मौसम को गुजर जाने की जल्दी थी

वो शाखों से जुदा होते हुए पत्तों पे हँसते थे

बड़े जिंदा-नज़र थे जिन को मर जाने की जल्दी थी

मैं साबित किस तरह करता कि हर आईना झूठा है

कई कम-ज़र्फ़ चेहरों को उतर जाने की जल्दी थी

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लवे दीयों की हवा में उछालते रहना

गुलो के रंग पे तेजाब डालते रहना

मैं नूर बन के ज़माने में फ़ैल जाऊँगा

तुम आफताब में कीड़े निकालते रहना

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लवे दीयों की हवा में उछालते रहना

गुलो के रंग पे तेजाब डालते रहना

मैं नूर बन के ज़माने में फ़ैल जाऊँगा

तुम आफताब में कीड़े निकालते रहना

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सफ़र की हद है वहां तक की कुछ निशान रहे,

चले चलो की जहाँ तक ये आसमान  रहे ।

ये क्या उठाये कदम और आ गयी मंजिल,

मज़ा तो तब है के पैरों में कुछ थकान रहे ।

वो शख्स मुझ को कोई जालसाज़ लगता हैं,

तुम उसको दोस्त समझते हो फिर भी ध्यान रहे ।

मुझे ज़मीं की गहराइयों ने दबा लिया,

मैं चाहता था मेरे सर पे आसमान रहे ।

अब अपने बीच मरासिम नहीं अदावत है,

मगर ये बात हमारे ही दरमियान रहे ।

सितारों की फसलें उगा ना सका कोई,

मेरी ज़मीं पे कितने ही आसमान रहे ।

वो एक सवाल है फिर उसका सामना होगा,

दुआ करो कि सलामत मेरी ज़बान रहे ।

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तुफानो से आँख मिलाओ, सैलाबों पे वार करो

मल्लाहो का चक्कर छोड़ो, तैर कर दरिया पार करो

तुमको तुम्हारा फ़र्ज़ मुबारख, हमको मुबारख अपना सुलूक

हम फूलो की शाख तराशे, तुम चाकू पर धार करो

फूलो की दुकाने खोलो, खुशबु का व्यापार करो

इश्क खता हैं, तो ये खता एक बार नहीं, सौ बार करो

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उसकी कत्थई आंखों में हैं जंतर मंतर सब

चाक़ू वाक़ू, छुरियां वुरियां, ख़ंजर वंजर सब

जिस दिन से तुम रूठीं,मुझ से रूठे रूठे हैं

चादर वादर, तकिया वकिया, बिस्तर विस्तर सब

मुझसे बिछड़ कर, वो भी कहां अब पहले जैसी है

फीके पड़ गए कपड़े वपड़े, ज़ेवर वेवर सब

इश्क-विश्क के सारे नुस्खे मुझसे सिखते है

ताहिर-वाहिर, मंज़र-वंज़र, जोहर-वोहर सब

आखिर मैं किस दिन डूबूंगा फ़िक्रें करते हैं

कश्ती-वश्ती, दरिया-वरिया, लंगर-वंगर सब

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rahat indori ser shyari in hindi 2019


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जा के ये कह दे कोई शोलों से चिंगारी से

फूल इस बार खिले हैं बड़ी तैयारी से

अपनी हर साँस को नीलाम किया है मैंने

लोग आसान हुए हैं बड़ी दुश्वारी से

ज़हन में जब भी तेरे ख़त की इबारत चमकी

एक खुश्बू सी निकलने लगी अलमारी से

शाहज़ादे से मुलाक़ात तो ना-मुमकिन है

चलिए मिल आते है चल कर किसी दरबारी से

बादशाहों से भी फेंके हुए सिक्के न लिए

हम ने खैरात भी माँगी है तो खुद्दारी से

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बन के इक हादसा बाज़ार में आ जाएगा

जो नहीं होगा वो अखबार में आ जाएगा

चोर उचक्कों की करो कद्र, की मालूम नहीं

कौन, कब, कौन सी  सरकार में आ जाएगा

अपनी साहिल से ये अंगारे हटालो वरना

सारा पानी मेरी तलवार में आ जाएगा

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लोग हर मोड़ पे रुक-रुक के संभलते क्यों हैं

इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं

मैं न जुगनू हूँ, दिया हूँ न कोई तारा हूँ

रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं

नींद से मेरा त’अल्लुक़ ही नहीं बरसों से

ख्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं

मोड़ होता है जवानी का संभलने के लिए

और सब लोग यहीं आके फिसलते क्यों हैं

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साँसों की सीडियों से उतर आई जिंदगी

बुझते हुए दिए की तरह, जल रहे हैं हम

उम्रों की धुप, जिस्म का दरिया सुखा गयी

हैं हम भी आफताब, मगर ढल रहे हैं हम

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इश्क में जीत के आने के लिए काफी हूँ

मैं निहत्था ही ज़माने  के लिए काफी हूँ

हर हकीकत को मेरी, ख्वाब समझनेवाले

मैं तेरी नींद उड़ाने के लिए काफी हूँ

मेरे बच्चो मुझे दिल खोल के तुम खर्च करो

मै अकेला ही कमाने के लिए काफी हूँ

एक अख़बार हूँ, औकात ही क्या मेरी

मगर शहर में आग लगाने के लिए काफी हूँ

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दिलों में आग लबों पर गुलाब रखते हैं

सब अपने चेहरों पे दोहरी नका़ब रखते हैं

हमें चराग समझ कर बुझा न पाओगे

हम अपने घर में कई आफ़ताब रखते हैं

बहुत से लोग कि जो हर्फ़-आश्ना भी नहीं

इसी में खुश हैं कि तेरी किताब रखते हैं

ये मैकदा है, वो मस्जिद है, वो है बुत-खाना

कहीं भी जाओ फ़रिश्ते हिसाब रखते हैं

हमारे शहर के मंजर न देख पायेंगे

यहाँ के लोग तो आँखों में ख्वाब रखते हैं

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राज़ जो कुछ हो इशारों में बता भी देना

हाथ जब उससे मिलाना तो दबा भी देना

वैसे इस खत में कोई बात नहीं हैफिर भी

एतिहातन इसे पढ़ लो तो जला भी देना

नशा वेसे तो बुरी शै है, मगर

“राहत” से सनना हो तो थोड़ी सी पिला भी देना

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इन्तेज़ामात  नए सिरे से संभाले जाएँ

जितने कमजर्फ हैं महफ़िल से निकाले जाएँ

मेरा घर आग की लपटों में छुपा हैं लेकिन

जब मज़ा हैं तेरे आँगन में उजाला जाएँ

गम सलामत हैं तो पीते ही रहेंगे लेकिन

पहले मयखाने की हालत संभाली जाए

खाली वक्तों में कहीं बैठ के रोलें यारों

फुरसतें हैं तो समंदर ही खंगाले जाए

खाक में यु ना मिला ज़ब्त की तौहीन ना कर

ये वो आसूं हैं जो दुनिया को बहा ले जाएँ

हम भी प्यासे हैं ये अहसास तो हो साकी को

खाली शीशे ही हवाओं में उछाले जाए

आओ शहर में नए दोस्त बनाएं “राहत”

आस्तीनों में चलो साँप ही पाले जाए

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ये हादसा तो किसी दिन गुज़रने वाला था

मैं बच भी जाता तो इक रोज़ मरने वाला था

तेरे सलूक तेरी आगही की उम्र दराज़

मेरे अज़ीज़ मेरा ज़ख़्म भरने वाला था

बुलंदियों का नशा टूट कर बिखरने लगा

मेरा जहाज़ ज़मीन पर उतरने वाला था

मेरा नसीब मेरे हाथ काट गए वर्ना

मैं तेरी माँग में सिंदूर भरने वाला था

मेरे चिराग मेरी शब मेरी मुंडेरें हैं

मैं कब शरीर हवाओं से डरने वाला था

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इससे पहले की हवा शोर मचाने लग जाए

मेरे “अल्लाह” मेरी ख़ाक ठिकाने लग जाए

घेरे रहते हैं खाली ख्वाब मेरी आँखों को

काश कुछ  देर मुझे नींद भी आने लग जाए

साल भर ईद का रास्ता नहीं देखा जाता

वो गले मुझसे किसी और बहाने लग जाए

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दोस्ती जब किसी से की जायेदुश्मनों की भी राय ली जाए

मौत का ज़हर हैं फिजाओं मेंअब कहा जा के सांस ली जाए

बस इसी सोच में हु डूबा हुआये नदी कैसे पार की जाए

मेरे माज़ि के ज़ख्म भरने लगेआज फिर कोई भूल की जाए

बोतलें खोल के तो पि बरसोंआज दिल खोल के पि जाए

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फैसला जो कुछ भी हो, हमें मंजूर होना चाहिए

जंग हो या इश्क हो, भरपूर होना चाहिए

भूलना भी हैं, जरुरी याद रखने के लिए

पास रहना है, तो थोडा दूर होना चाहिए

कट गई है उम्र सारी जिनकी पत्थर तोड़ते

अब तो इन हाथो में कोहिनूर होना चाहिए

अपने हाथों से बनाया है खुदा ने आपको

आपको थोड़ा बहुत मगरूर होना चाहिए

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यही ईमान लिखते हैं, यही ईमान पढ़ते हैं

हमें कुछ और मत पढवाओ, हम कुरान  पढ़ते हैं

यहीं के सारे मंजर हैं, यहीं के सारे मौसम हैं

वो अंधे हैं, जो इन आँखों में पाकिस्तान पढ़ते हैं

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चलते फिरते हुए महताब दिखाएंगे तुम्हें ,

हमसे मिलना कभी, पंजाब दिखाएंगे तुम्हें |

चांद हर छत पर है, सूरज है हर आंगन में,

नींद से जागो तो कुछ ख्वाब दिखाएंगे तुम्हें |

रेत बन जाता है, उड़ जाता है सारा पानी

जून में गांव का तालाब दिखाएंगे तुम्हे

पूछते क्या हो कि रुमाल के पीछे क्या है,

फिर किसी रोज ये सैलाब दिखाएंगे तुम्हें |

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इस दुनिया ने मेरी वफ़ा का कितना ऊँचा मोल दिया,

पैरों में जंजीरे डाली हाथों में कश्कोल दिया

जब भी कोई इनाम मिला है मेरा नाम भी भूल गए,

जब भी कोई इलज़ाम लगा है मुझ पे लाकर ढोल दिया

अब गम आये, खुशिया आये, मौत आये, या तू आये,

मैंने तो बस आहट पायी और दरवाज़ा खोल दिया।

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मौसमो का ख़याल रखा करोकुछ लहू में उबाल रखा करो

जिंदगी रोज़ मरती रहती हैठीक से देखभाल रखा करो

जाने कब सच का सामना हो जाएकोई रास्ता निकाल रखा करो

गालिबो को रखो दिमागों मेंदिल यागना मिसाल रखा करो

सुलाह करते रहा करो हर दिनदुश्मनो को निढाल रखा करो

खाली खाली उदास आँखेईनमे कुछ ख्वाब पाल रखा करो

धुप पर सारा काम छोड़ दियाखून में कुछ उछाल रखा करो

फिर वो चाकू चला नहीं सकताहाथ गर्दन में डाल रखा करो

लाख सूरज से दोस्ताना होचंद जुगनू भी पाल रखा करो

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अब हम मकान में ताला लगाने वाले हैं

पता चला हैं की मेहमान आने वाले हैं

इन्हें जहाज़ की उचाईयो से क्या मतलब

ये लोग सिर्फ कबूतर उड़ाने वाले है

हमें हक़ीर न जानो, हम अपने नेज़े से

ग़ज़ल की आँखों में काजल लगाने वाले है

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आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो

ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो

राह के पत्थर से बढ़ कर कुछ नहीं हैं

मंज़िलें रास्ते आवाज़ देते हैं सफ़र जारी रखो

एक ही नदी के हैं ये दो किनारे दोस्तो

दोस्ताना ज़िंदगी से मौत से यारी रखो

आते जाते पल ये कहते हैं हमारे कान में

कूच का ऐलान होने को है तय्यारी रखो

ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ायम रहे

नींद रखो या न रखो ख़्वाब मे यारी रखो

ये हवाएँ उड़ न जाएँ ले के काग़ज़ का बदन

दोस्तो मुझ पर कोई पत्थर ज़रा भारी रखो

ले तो आए शायरी बाज़ार में ‘राहत’ मियाँ

क्या ज़रूरी है कि लहजे को भी बाज़ारी रखो

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